आजाद खबर की कीमत देनी होगी…

Azad khabar

आजाद खबर की कीमत देनी होगी… साइंस का फलसफा है, कि आवाज को माध्यम की जरूरत है। बिना माध्यम, आवाज तैर नही सकती, सुनाई देती नही। आपके और मेरे बीच से, माध्यम..याने ये मीडिया हट जाए तो न कहा जा सकेगा, न सुना जा सकेगा। इसलिए फासिज्म, माध्यम पर पहला कब्जा करता है। उसे डराता, धमकाता, खरीदता और तोड़ता है। चुन- चुनकर.. !!! जी हां, जो उनकी बात हमें सुनाए, वो मीडिया तो जिंदा रहेगा। गोद मे बिठाया जाएगा। खिलाया, पिलाया, दुलारा जाएगा। मगर तोड़ दिया जाएगा उस मीडिया को, जो हमारी बात, हम तक पहुचाने की हिमाकत करे। इसलिए कि ये मीडिया तो खतरा होता है। भारत का मौजूदा दौर इसी प्रवृति का क्लासिक केस है। हम हिंदुस्तानी, हमारी पीढ़ी दुर्भाग्य से इस दौर को झेलने, लड़ने, जीतने या फिर आजादी खो देने के संघर्ष में झोंक दी गयी है। हर माध्यम, सलेक्टिवली फिल्टर होकर आप तक आ रहा है। फिल्में चुनकर बायकॉट होती है, चुनकर प्रमोट होती हैं। किताबे एडिट होती हैं। खबरे चुनकर छपती हैं, और चुनकर पन्नो से हटाई भी जाती हैं। टीवी सास बहू का नशा बेचेगा, या जहरीली खबरे। जो कुछ सन्तुलित है, सच है, जो उद्वेलित कर सकता है, रिस्ट्रिक्टेड है। सरकार को वही मीडिया चाहिए, जो साफ सुथरा, समर्थक और सच से ध्यान हटाने वाला हो। Ravish Kumar बड़े भाग्यशाली है, जिन्हें लम्बी पारी, बड़ा प्यार और पहचान मिली। उन्हें किसी ट्रक वाले से कुचलवाया न जा सका, कहीं जेल में डाला न जा सका, खरीदा और डराया न जा सका। तो सरकारी जल्लाद के पैसों से उनका संस्थान ही नष्ट कर दिया गया है। Ajit Anjum, Punyaprasun Vajpai जैसे लोग इतने भाग्यशाली नही थे। उन्हें बाहर का रास्ता दिखाकर, उनकी जगह को चिप वाली बाईयों और काले सफेद तिहाड़ियो से भर दिया गया। एनडीटीवी पर अडानी का जबरिया कब्जा, नग्नता का आदर्श उदाहरण था। जनता के बैंकों से पैसा लेकर गले गले कर्ज में डूबे इंसोल्वेंट अरबपति को, मालिक का जल्लाद भी बनना पड़े, तो बनेगा। आगे क्या होगा? क्या खुली आवाज वाले अदाणी के एयरपोर्ट से उड़ान भरने से रोके जाएंगे? क्या हुजूर को वोट न देने वाले मोहल्लों, शहरों की बिजली, उसकी पावर कम्पनी काट देगी?? विपक्ष को जिताने वाले राज्यो का इन्वेस्टमेंट, रोजगार, तो काटा ही जा रहा है। फासिज्म कठोर से कठोरतम होता जाएगा। लेकिन साइंस का फलसफा यह भी .., कि जो जितना कठोर होता है, उतना भंगुर भी होता हैं। जब बिखरे.. तो छोटे छोटे टुकड़ों में फना हो जाता है। उसे यह चोट, हमारी आवाज दे सकती है। मेरी आवाज का आप तक पहुँचना, इसका मिलना, जुड़कर गर्जना में बदल जाना जो कम्पन पैदा करेगा, वही इस फासिज्म को जरूरी ताकत से चोट कर पायेगा। और आवाजें जुड़ने के लिए मीडिया को जिंदा रखना है। देखना होगा, कि मेरा खबरची, पेट पालने के लिए “सरकारी ठेको पर जीने वाले” कारपोरेटों का गुलाम न रहे। खबरे, हमारी सीधे दी गयी कीमत पर आज़ाद रहें। मुफ्त पढ़ना छोड़िए। टीवी, अखबार छोड़िए। जो सही बात करे, उसे चुनिये, पालिए, और काम करने की आजादी दीजिए। चुन लीजिए कोई एक, जिसकी आवाज आपकी आवाज का आईना हो। उसे बस एक वक्त के खाने का अंशदान दीजिए। ईमान की आवाज को, इससे ज्यादा कुछ नही चाहिए। ये करके गुरुर मत पालें। आप अहसान नही करेंगे। क्योंकि आप उसकी जान की गारंटी नही ले सकते। उसके मुकदमे नही लड़ सकते। उसके मानसिक तनाव, उसके ज्वर और ताप को शांत नही कर सकते। घर बैठ, उसकी ढाल भी तो नही बन सकते। वो माद्दा नही आपमे.. इसलिए वही करें, जो कर सकते हैं। महीने या साल के एक दिन, एक वक्त की रोटी का अंशदान… साइंस का फलसफा है, कि आवाज को माध्यम की जरूरत है। बिना माध्यम, आवाज तैर नही सकती, सुनाई देती नही। बिन आवाज, आप पशुओं की तरह, बिना चीख के बलि होने को अभिशप्त होंगे। जिंदा रहना है, तो आजाद खबर की कीमत, देनी होगी…