Chandu Khana : आधी हकीकत आधा फसाना

Chandu Khana आधी हकीकत आधा फसाना

चंडूखाना Chandu Khana शब्द सुनकर बहुतों को लगता है कि यह गाली या अपमानजनक जैसा कुछ है। जब कभी भी इस शब्द का इस्तेमाल किया जाता है, सामने वाला संभ्रांत नारंगी टाईप शख्स एकदम से भड़क सा जाता है। मेरे भी एक मित्र को लगा कि गाली है तो वहीं एक अनय ने इसका अर्थ पूछा तो सोचा आज बता ही देते हैं। दरअसल एक दौर में देश के कई इलाकों में अफीम की खेती होती थी। अफीम के शौकीनों के लिए अफीम की छोटी.छोटी गोलियां बनाई जातीं। गोलियां ही चंडू कहलाती। इन गोलियों को ख़ास तरह के हुक्के पर तम्बाकू की तरह पिया जाता। तो जैसे आजकल हुक्का बार या शराब के बार का चलन है तब चंडू खाने हुआ करते थे लेकिन इसका नशा भी आला दर्जे का होता। पीते ही नशेड़ी दुनिया से बेख़बर हो जाता। चंडूबाज चाहे खड़े होकर पिए या फिर बैठकर, पीने के बाद उसका विशुद्ध शराबियों की तरह लुढकना तय होता था। इसलिए चंडू आमतौर पर चारपाई पर लेटकर ही पी जाती। तो चंडू बार मे कुर्सी मेज नही, खटिया लगी होती। चंडूबाज होश संभालते तो भी हवा में बात करते। उनके मुंह से कोई सच्ची बात निकलती ही नहीं थी। दिल्ली जा रहे हो तो कहते कलकत्ता जा रहा हूं। कलकत्ता जा रहे हों तो सीधे बंबई बताते। चंडू के लिए पैसे न होने पर चंडूबाज किसी धनी मानी से ऐसे.ऐसे बहानों से पैसे मांगते कि आप अपना खून बेचकर पैसे दे दें। पीने वाला पहले हर चार घंटे के हिसाब से चारपाई का किराया चुकाता। फिर चंडू की जितनी गोलियां पीनी होतीं उनकी क़ीमत एक्स्ट्रा। जितनी भी गोलियां पीनी होतीं उसे एक साथ पीनी पड़तीं। इसलिए कि एक गोली पीने के बाद वह दूसरी पीने भर को अपने होश सलामत न रख पाता! बहरहाल, जैसे ही चंडूबाज क़ीमत चुकाकर चारपाई पर लेटता, चंडूखाने का कोई नौकर हुक्के में लगा बड़ा.सा पाइप लाता और उसके होठों से लगा देता। हुक्के की गुड़गुड़ी वाले हिस्से के पास बैठा आदमी चिल्लाकर पूछता, पहलवान तैयार! और उसके हां कहते ही चंडू की गोली हुक्के की चिलम में धधक रही आग में डाल देता। इसके बाद गोली फटने की हलकी.सी आवाज़ होती। पीने वाला पाइप के ज़रिए सारा नशा भीतर सुड़क लेता और सुध.बुध खो बैठता। उसने चार घंटों के लिए ही चारपाई का किराया दिया होता तो चार घंटों बाद उसे जबरन जगाया और अपने घर जाने को कहा जाता।
वह जाने की हालत में न होता तो उससे चारपाई का अगले चार घंटों का किराया भी वसूल लिया जाता। लेकिन रात 10 बजते.बजते उसे हर हाल में चारपाई छोड़नी होती क्योंकि वह चंडूखाना Chandu Khana बंद होने का वक़्त होता। पीने वाले की सुधबुध तब तक भी वापस नहीं आई होती तो उसे जैसे.तैसे उठाया जाता और तांगे या रिक्शे वालों के हवाले कर दिया जाता। अगर चंडूबाज पुराना ग्राहक होता तो तांगे वालों को मालूम पहले होता कि उसे कहां ले जाना है। नया होता तो किसी तरह से उससे घर का पता पूछ लेते। घर पहंचने पर घरवालों से भरपूर उगाही की जाती।अहसान भी जताते कि होश.हवास में न होने के बावजूद उससे कोई बेहूदगी नहीं की गयी। यूँ बचाकर लाए हैं कि कहीं एक भी खरोंच न लगने दी। गप्पों का आदान.प्रदान चंडूखानों में या दो चंडूबाजों के बीच ही नहीं होता। पीने वाले घर पहुंचते और नशा थोड़ा उतरता तो भी उन्हें लगता रहता कि वे हवा में उड़े जा रहे हैं। तब वे वहां भी खूब बहकी.बहकी बेसिर.पैर की बातें करते। चंडूखाने की गप्प वाला मुहावरा इसी से उपजा। यूपी की राजधानी लखनऊ में 70 के दशक तक चंडूखाने हुआ करते थे। लेकिन बाद में जैसे.जैसे अफीम की खेती पर नियम.कायदों का शिकंजा कसता गया चंडूखाने और चंडूबाज भी कम होते गए। जो बच गए संगठित हुए। अब एक पार्टी बना ली है। गप्प मारते हैं, इलेक्शन जीतते हैं। सब ओर उनकी डबल इंजन सरकारें चलती हैं।