विपश्यना, सत्ता और आम आदमी !

विपश्यना, सत्ता और आम आदमी !

Jaipur. विपश्यना पर निकल लिए केजरीवाल.. ईडी का समन आया, तो किसी अनडिस्क्लोज्ड लोकेशन पर गायब हो गए हैं। आम आदमी होता तो इसे लीगल भाषा मे फरार होना कह सकते हैं। 2012 में उन्होंने ऐसे नेताओं पर ट्वीट किया था, जो फिर वाइरल हो रहा है। मगर मुझे केजरीवाल से सहानुभूति है। आज सड़क पर घूमते करोड़ो चुनावी विश्लेषकों की तरह वे भी तो उस वक्त मासूम गदहे ही थे। तब तो केजरीवाल ने वादा किया था कि चुनावी फंडिंग को पारदर्शी बनाएंगे। अपने चन्दे का एक एक रुपए का हिसाब देंगे। फिर अपनी पार्टी के डोनेशन का वेबसाइट भी बनाया और दानदाताओं की सूची भी सार्वजनिक कर दी। दुष्ट सत्ता को और क्या चाहिए। लिस्ट डाउनलोड की, और उनके दानदाताओं को छीलना शुरू किया। रोते गाते दानदाताओं ने गुहार लगाई-माई बाप, लिस्ट को सार्वजनिक करना बंद करो। सर जी ने बच्चो की कसम खाई की राजनीति में नही आऊंगा। फिर आ गए। बंगला नही लूंगा, ले लिया। कार नही लूंगा, वैगन आर में घूमूंगा। फिर फ्लीट खरीदा। दिल्ली के विधायकों का वेतन पूरे भारत मे सर्वाधिक है। मैं आलोचना इसकी भी नही करता। वैगन आर सीएम के लिए सुरक्षित नही, बंगला ऑलमोस्ट ऑफिस ही होता है। आप अपने फ्लैट में 200 स्टाफ बिठा नही सकते, अपनी कालोनी के लोगो को बंधक बना नही सकते। बंगला लेना उचित है।। लेकिन पहले इन चीजों पर अनावश्यक बकलोली करना भोलापन था। केजरीवाल की तरह हम भी भोले मासूम लोग थे। अन्ना टोपी लगाकर हमने केजरी भाई की पहली शपथ के समय भरे गले से -” इंसान का इंसान से हो भाईचारा” गाया था। सोचते थे कि सफेद घोड़े पर एक जनलोकपाल आएगा, जिसे तमाम रोड रोलर ताकते दे दी जाये, तो देश का कल्याण हो। उसी समय सफेद दाढ़ी वाले जनलोकपाल ने शपथ ली। उसके पास किसी को भी जेल भेजने की पावर है। रोकने की औकात किसी की नही। अब सारा भारत सिर धुनते सोच रहा है कि इसकी ताकत को लगाम कैसे दी जाये। केजरीवाल उसी तरह की बेलगाम ताकत से जान बचाकर भागते फिर रहे हैं, जिसे बनवाने के लिए सम्पूर्ण महाभारत रचा था। नैतिकता के भोलेनाथ राहुल भी बने थे। किसी केस में कोई कन्विक्ट हो जाये, तो चटपट चुनाव के अयोग्य हो जाये, इस मंशा के साथ कन्विकटों को बचाने का अध्यादेश “फाड़कर फेकने” की सलाह दी थी। वही गले पड़ गया। चोर को चोर बोलने की सजा मिली, उस पर डिस्क्वालिफाई हुए। कॅरियर ही खत्म होने के मुहाने पर था। किस्मत थी कि सुप्रीम कोर्ट में कुछ अवशेषी गैरत के टुकड़े बचे थे, तो लट पट बचे। मगर तलवार सर पर अब भी है। कानून कहता है कि 100 गुनहगार छूट जाएं, मगर एक निर्दोष को सजा नही होनी चाहिए। इसलिए कानून बनाते समय लम्बी बहस होना जरूरी है, बनिस्पत बहुमत के जोर पर बिन बात किये पास करा ले जाने के.. पर जनता खुश है। IPC-CRPC-एविडेन्स एक्ट बदल गया, उस संसद से जिसमे 60% विपक्ष निलंबित था। उसने दादागिरी, घर घुसकर मारने, बुलडोजर और लिंचिंग को त्वरित न्याय का सिंबल बना लिया है। फिलहाल औपनिवेशिक कानूनों से मुक्ति का जश्न है। पर वक्त सबका आता है। आएगा ही। और जब बुलडोजर घर के सामने आएगा, जब बेमतलब के केस में जमानत खारिज होगी, जब आपका अपराध साबित करना सरकार का जिम्मा नही, अपनी बेगुनाही साबित करना आपका जिम्मा होगा.. तब आज कूद कूदकर ताली और थाली बजाने वाले भी फरारी काटेंगे। भले शब्दो मे कहे तो अज्ञात स्थान पर विपश्यना करने जाएंगे।

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