जब Mahmood को कहा गया कि जरूरी नहीं कि एक अभिनेता का पुत्र भी अभिनेता बन सके

महमूद Mahmood Mehmood

अपने खास हास्य अंदाज के लिए प्रख्यात बाॅलीवुड कलाकार Mahmood को किसी जमाने में उनके ही फिल्मी जगत की हस्तियों ने अभिनय के मामले में नाकाबिल ठहरा दिया था और काम देने से भी मना कर दिया था लेकिन इस अजीमोतरीन कलाकार ने कभी अपना दिल छोटा नहीं किया और अपनी काबिलियत से एक्टिंग की दुनिया में वो मुकाम हासिल किया जो आज तक किसी को भी नसीब न हो सका। आज भी काॅमेडी की दुनिया में महमूद का नाम प्रासंगिक हैं। महमूद ने बतौर बाल कलाकार अपने सिने करियर की शुरूआत की थी। अपने बेहद खास अंदाज और आवाज से करीब पचास साल तक उन्होंने हिंदी सिनेमा पर राज किया। उनका जन्म वर्ष 1933 में और निधन 23 जुलाई 2004 को हुआ था।

लोकल ट्रेन टॉफिया बेचा करते थे Mahmood

Mahmood के पिता का नाम मुमताज अली था जो बॉम्बे टॉकीज स्टूडियो में काम किया करते थे। घर की माली हालत कुछ अच्छी न थी सो महमूद भी घर चलाने के लिए बंबई के मलाड और विरार के बीच लोकल ट्रेन टॉफिया बेचा करते थे। एक्टिंग की भूख महमूद साहब में बचपन से ही थी। अपनी किस्मत और पिता की सिफारिश से महमूद को वर्ष 1943 में बॉम्बे टाकीज की प्रदर्शित फिल्म में दादामुनि यानि अशोक कुमार के बचपन की भूमिका निभाने का मौका मिला और इस फिल्म का नाम था किस्मत। फिल्म किस्मत से महमूद को केवल एक शुरूआत मिली थी लेकिन आगे बढ़ने के लिए कुछ और भी चाहिये था इसलिए उन्होंने कार चलाना सीखकर मशहूर फिल्म निर्माता ज्ञान मुखर्जी के यहां बतौर ड्राईवर काम करना शुरू कर दिया क्योंकि इस बहाने आये दिन स्टूडियो जाने का मौका मिल जाया करता था। फिल्म कलाकारों की नजदीकियां पाने के लिए महमूद ने उस जमाने के गीतकार गोपाल सिंह नेपाली, भरत व्यास, राजा मेंहदी अली खान, निर्माता पी.एल. संतोषी के यहां भी ड्राइवर का काम किया।

मधुबाला भी बन गईं थी Mahmood की मुरीद

एक बार का किस्सा है कि मधुबाला फिल्म नादान की शूटिंग कर रही थीं। शूटिंग के दौरान एक जूनियर कलाकार लगातार दस रीटेक के बाद भी अपने डायलाॅग्स नहीं बोल सका तो फिल्म निर्देशक हीरा सिंह ने सेट पर मौजूद Mahmood को बोलने का मौका दिया। बस फिर क्या था। महमूद ने बिना कोई टेक-रिटेक अपना पूरा डायलाॅग बिना रूके बेहतर अदायगी के साथ बोल दिया। इसके बाद मधुबाला भी महमूद साहब की मुरीद हो गईं। इसके बाद महमूद ने ड्राइवर का काम छोड़ फिल्मों में काम पाने के लिये संघर्ष करना शुरू कर दिया। जूनियर आर्टिस्ट के तौर पर महमूद ने दो बीघा जमीन, जागृति, सीआईडी, प्यासा जैसी शानदार फिल्मों में अपने अभिनय के जलवे दिखाकर हीरो के परस्पर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई।

स्क्रीन टैस्ट में फेल हो गये थे Mahmood

एक बड़ा ही रोचक वाकया है कि एक बार महमूद ने ए वी मयप्पन की फिल्म मिस मैरी के लिये स्क्रीन टेस्ट दिया था लेकिन एवीएम प्रोडक्शंस बैनर ने महमूद को अपने स्क्रीन टैस्ट में फेल कर दिया। एवीएम प्रोडक्शंस का मानना था कि Mahmood में अभिनय क्षमता नहीं है। इसी दौरान महमूद के रिश्तेदार कमाल अमरोही ने भी महमूद को यह कहकर काम देने से मना कर दिया कि अभिनेता मुमताज अली के पुत्र होने से यह जरूरी नहीं कि महमूद में भी अभिनय क्षमता हो और यह भी जरूरी नहीं कि एक अभिनेता का पुत्र भी अभिनेता बन सके। महमूद के बारे में यह राय ज्यादा दिनों तक कायम नहीं रह सकी और कालान्तर में एवीएम बैनर ने महमूद को लेकर फिल्म मैं सुदर हूं बनाई जिसमें महमूद के साथ बिस्वजीत, लीना चंद्रावरकर, शबनम, अरुणा ईरानी, सुलोचना आदि ने भी काम किया।